Thursday, October 20, 2011

पहले वाह-वाही......फिर कार्यवाही !

(यह  लेख साप्ताहिक " अमर ज्वाला " (हिमाचल) समाचार पत्र अंक १२ जून २०११ में प्रकाशित हो चुका है )   
क्या  आपने कभी  बस द्वारा लंबी दूरी की यात्रा की है  ? अवश्य ही की होगी ...जहाँ रेल सुविधा उपलब्ध नहीं है....वहाँ तो आवा-गमन के लिए  बस ही सबसे सुविधा जनक साधन है . आठ-दस घंटों  की लगातार यात्रा के बाद जब बस का चालक बदला जाता है तब बस की चाल चलाने के तरीके से ही  सभी यात्रियों को चाहे वोह सोये हुए हों या अधजगे ... एकाएक महसूस हो जाता है कि कुछ बदलाव अवश्य ही है....यानि बस का चालक अब बदल गया है . बहुत बार ऐसा भी होता है कि चालक के बदलते ही बस दुर्घटना ग्रस्त हो जाती है . यही सब बाबा राम देव के " काला-धन  और भ्रष्टाचार "  पर चल रहे  अनशन को लेकर  केन्द्रिय सरकार के रवैये से परिल्क्षीत होता है .  
क्या आप प्रबुद्ध पाठक-जनों  को  ४ जून से पूर्व और ४ जून के बाद के धटनाक्रम से कुछ ऐसा ही प्रतीत नहीं हुआ...कि अचानक देश की बागडोर किसी अन्य के हाथ में चली गई है  ?  ५ जून की रात में दिल्ली  की राम-लीला मैदान में जो महाभारत हुआ ...उसका अंदेशा किसी को भी नहीं था . आज भी देश वासी समझने में असमर्थ हैं कि उस रात  ऐसी कौन सी मुसीबत अचानक आन पडी थी इस देश पर या दिल्ली पर कि रात को सोते हुए अनशनकारियों पर पुलिस वाले दमनकारी बन कर टूट पड़े . उन  निरीह अनशनकारियों  में १०-१२ वर्ष के बच्चों से लेकर ८०-८५ वर्ष तक की महिलाएं और  पुरुष दोनों ही थे .  धार्मिक और आध्यात्मिक गुरुओं के आह्वान पर पचास हजार से लेकर एक लाख भारतवासियों ने जिस शान्ति से उस रात दिल्ली पुलिस की बर्बरतापूर्ण दमन की कार्यवाही को सहन किया उसकी मिसाल मिलना कठिन है .
तीन जून को बाबा रामदेव के दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुँचाने से पूर्व ही जिस प्रकार पलक-पावडे बिछा कर केन्द्रिय सरकार के चार-चार मंत्री-गण अगवानी और स्वागत-सत्कार के  लिए तैनात थे ...उससे जरा झटका तो अवश्य ही लगा कि अचानक ऐसा क्या हो गया कि केद्रीय मंत्री-मंडल में प्रधान मंत्री के बाद दूसरा स्थान रखने वाले प्रणव मुखर्जी अपने तीन-तीन वरिष्ठ सहयोगियों सहित बाबा के स्वागत के लिए इंदिरा गांधी अन्तराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुँच गए और ऐसा अति विशिष्ठ व्यवहार और स्वागत  ? फिर सोचा कि शायद चर्चा के लिए राम-लीला मैदान उपयुक्त न हो तो इसी कारण हवाई-अड्डे पर ही चर्चा के लिए गए होंगे...!  हवाई अड्डे पर जाने का कारण कुछ भी रहा हो , आम जनता पर  बाबा राम देव और  सरकार का अच्छा सन्देश गया कि भ्रष्टाचार और काले धन के मामले पर सरकार भी उतनी ही संवेदनशील और फिकरमंद है और बातचीत के पश्चात् शायद शीघ्र ही  कोई अध्यादेश जारी हो जाये .  वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था से त्रस्त  देश की  आम  जनता बहुत बेसब्री से यह आस लगाये बैठी थी मानो यह योग गुरु बाबा ना होकर एक दिव्य शक्ति से परिपूर्ण अवतार ही है जो इस देश को वर्तमान के सभी संकटों से उभार कर पुनः विश्व-गुरु के पद पर प्रतिष्ठित कर देंगे .
अगले दिन यानि 4 जून को रामलीला मैदान में  अनशन प्रारम्भ हो गया और अगली  बैठक कहाँ होगी दोपहर तक इसी पर  अटकलें लगती रही .  सायें-काल लगभग ७ बजे तक चली बातचीत के बाद बाबा ने राम-लीला मैदान में अनशन पर बैठे भगतों को जब संबोधित किया तो उनके चेहरे पर न तो वोह तेज  था और न ही उनकी वाणी  में वोह उत्साह ही था जो  अमूमन हुआ करता था ....हाँ शब्दों में एक आशा अवश्य ही झलकती थी . अपने संबोधन में  बाबा ने यह अवश्य ही स्पष्ट कर दिया था कि यदि  " उनको हिरासत में ले लिया जाता है तो उनके भगत और अनुयायी इसी प्रकार शांति से अनशन करते रहेंगे . ठीक ९ बजे कपिल सिब्बल ने जब पत्रकारों को संबोधन करते  हुए आचार्य बाल कृषण द्वारा  एक साधारण से  पन्ने पर लिखी हुईं कुछ पंक्तियाँ जब  पत्रकारों को दिखलाईं और एक धमकी भरा वाक्य कह कि " हम बाबा जी को सम्मान देकर बातचीत कर रहे हैं तो ..हम बाबा का विनाश भी कर सकते है ..कपिल सिब्बल ने इंग्लिश का Ruin शब्द प्रयोग किया . कपिल सिब्बल लहजा ही कुछ ऐसा आभास दे रहा था कि अब बस का चालक बदल गया है . अब बाबा को डील करने वाले बदल गए हैं . सरकार अब किस दिशा में चल पडी है यह उसकी भाषा और तेवरों से भी स्पष्ट झलकने लगा था . 
हवाई अड्डे पर चार चार मंत्रियों के जाने और योग गुरु की मान-मुनवल  करने से सरकार और कांग्रेस पार्टी की बहुत छीछालेदर हो चुकी थी . एक पांच सितारा होटल में चार घंटे तक चली बैठक में उस दिन क्या हुआ होगा आज देश का प्रत्येक प्रबुद्ध नागरिक समझ सकता है . योग गुरु और आचार्य बाल कृष्ण पर उस होटल में किस प्रकार का दबाव था और किस परिस्तिथि में अनशन तोड़ने या समाप्त करने पर रजामंदी दी होगी ..... एक साधारण से पन्ने पर आचार्य बाल कृष्ण द्वारा लिखित उन चंद पंक्तियों से यह भली-भांति समझा जा सकता है . उस रात बाबा ने अनशनकारियों से अपने अंतिम संबोधन में बहुत से संकेत दिए थे . आज यदि हमको वह पुरानी रेकॉर्डिंग मिल जाये और उसे घटनाक्रम  से जोड़ते हुए देखें तो सब कुछ भली-भांति समझ में आ जाता है . कितनी बेबसी , कितना आक्रोश और कुठाओं से भरी उनकी वाणी परन्तु शब्दों में फिर भी एक आशा की झलक मिलती थी . मै व्यक्तिगत  तौर से योग गुरु का अनुयायी नहीं हूँ....हाँ उनकी बहुत सी बातों का प्रशंशक अवश्य ही हूँ  और इसी लिए मैं उनका सम्मान भी करता हूँ .
अब आयी वोह भयावह काली रात ....जब रात्री को सोये हुए अनशनकर्ताओं  पर  बर्बरता पूर्वक  लाठी चार्ज और  आंसू गैस के गोलों की बरसात की गई . अर्ध-सुप्त से अनशन कारियों जिसमें बच्चे , जवान और बूड़े स्त्री व पुरुष दोनों ही थे , को पहले तो यह समझ में ही नहीं आया कि अचानक यह क्या हो गया है  ? कहीं से डंडा , कहीं से आंसू गैस के गोले  फिर अचानक ही कही से पथराव . मंच के अतिरिक्त दो तीन अन्य स्थानों से आग लगना . अपने प्राणों से अधिक बाबा राम देव के प्राणों की चिंता में उनके अनुयायी ...बाबा को अकेला छोड़ कर कैसे चले जायें .  बिना बाबा को बतलाये जायें भी कहाँ और क्यूँ  ? अभी चंद घंटों पहले तो सब कुछ ठीक ठाक था .....अब अचानक बिना किसी कारण...बिना किसी चेतावनी के यह सब क्या हो रहा है ? क्या भ्रष्टाचार  और विदेशी बैंकों में जमा काले धन की बात करना अचानक इतना बड़ा अपराध हो गया  ? यह कैसी स्वतंत्रता ....यह कैसा लोकतंत्र  ? क्या  देश हित या जन हित  के कार्य के लिए अहिंसक दबाव बनाना भी अपराध हो गया है ? राम लीला मैदान में आज्ञा लेकर योग के स्थान पर अनशन करना अचानक बहुत बड़ा अपराध हो गया  ? स्वतंत्रता पूर्व ब्रितानी सरकार द्वारा किया गया दमन  और  १९७५ का आपातकाल ..न अपील ,,न वकील,,न दलील . यही सब कुछ ही तो झेला था इस देश ने . क्या हम देश वासी इतने दुर्भाग्यशाली हैं कि २५ जून १९७५ की त्रासदी  पुनः ५ जून २०११ को झेलने को विवश हों .
अभी कल की ही तो बात है .......जातिगत आरक्षण के लिए दो बार जुर्जरों  और  जाटों  ने दस-बारह दिनों तक उत्तर भारत में हड़ताल कर  जिस  प्रकार रेलवे और देश को आर्थिक नुकसान पहुँचाया और दिल्ली व उत्तर भारत को एक प्रकार से बंधक बना कानून-व्यवस्था का संकट पैदा कर दिया था  . क्या रामलीला मैदान में किया जा रहा वह  अनशन इन सब से भी इतना अधिक खतरनाक था कि सरकार को अर्ध-रात्री में सोते हुए निरीह और अहिंसक अनशन कर्ताओं पर इतनी बर्बरता दिखलानी पडी  ?  हमारा युवराज आधी रात को धारा १४४ को तोड़ कर अपने सुरक्षा कर्मियों की सहायता से नोयडा के गाँव में जा सकता है ...क्या वह कानून के दृष्टी से अपराध नहीं है ? उसके विरुद्ध काउ सी कारवाही की गई थी  ? असंख्य प्रश्न हैं परन्तु प्रश्नों  का उत्तर देने को कोई तैयार नहीं....! केन्द्रिय सरकार के इस प्रकार के आचरण से तो यही प्रदर्शित हुआ की देश में भ्रष्टाचार और काला धन जमा करने वालों का पोषण और संरक्षण वही कर रही है या उन लोगों में उनका निजी स्वार्थ है .   
एक दागी और महाभियोग का आरोप झेल रहे न्यायाधीश की लोक सभा में पैरवी करने पर प्रसिद्ध हुए कपिल सिब्बल रामलीला मैदान में अर्ध-रात्री को पुलिस द्वारा बर्बरता पूर्वक कार्यवाही पर कहते हैं कि कोई लाठी चार्ज नहीं हुआ है...और न ही कोई घायल हुआ है . पुलिस का भी यही कहना है . क्या इस प्रकार के संतरियों-मंत्रियों पर ( Perjury  )  का मुकद्दमा नहीं चलना चाहिए ? क्या सरकार की स्तिथि हास्यापद नहीं हो जाती जब अगले ही दिन केद्रीय गृह-मंत्री घायलों को मुआवजा देने की बात करते नजर  आते हैं . जब कोई घायल ही नहीं तो मुआवजा किस बात का ?   सैकड़ों की संख्या में घायल और कुछ की हालत नाजुक भी बताई जा रही है और इनमें एक दो तो हिमाचल से भी हैं .  कितने तो अभी भी लापता बताये जा रहे है ......न जाने वोह कहाँ और किस हाल में हैं  ? केन्द्रिय  सरकार  और कांग्रेस पार्टी दोनों ही अपने-अपने तरह से बयान-बाजी कर और  मीडिया द्वारा कुछ ब्रमित करने वाली बातें फैला कर योग गुरु बाबा , आचार्य  बाल कृष्ण और इनकी तमाम संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने की नाकाम कुचेष्ठा कर रहे हैं . यह सब असली मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए बड़े बेशर्मी से किया जा रहा है . यह दोनों साथ साथ नहीं चल सकता . पूर्व में भी एक तरफ  प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में बातचीत की जा रही थी....और दूसरी ओर लोक-तंत्र में राज-शाही का झंडा उठाये कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह  " न जाने " किसके आदेश से अपना भोंपू बजाये जा रहे थे . लगता है यह  " न जाने " ही दूसरा चालक है जिसके हाथ में बस का स्टेयरिंग आते ही बस दुर्घटना ग्रस्त हो गई .
उधर बाबा राम देव का अनशन जारी है ....और चिकित्सकों की राय में स्तिथि चिंता-जनक है . देश भर के धार्मिक और आध्यात्मिक साधू-संत अब हरिद्वार की ओर रुख कर रहे है . केद्रीय सरकार भी बाबा के स्वास्थ्य के विषय में चिंता जता रही है . अस्पुष्ट समाचारों के अनुसार अब पुनः पुराने वाले  चालक के हाथ में ही बस का स्टेयरिंग दिया जा रहा है . अब  की  बार बस चलाने के साथ साथ  Damage control और नुक्सान-भरपाई का भी काम देखेंगे . ईश्वर करे सभी घायल अति-शीघ्र स्वस्थ हो अपने घरों को लौटें . इस सारे काण्ड का यदि हम  निष्पक्ष आंकलन करें तो पाएंगे कि अनशन कारियों का भी कुछ विशेष नुक्सान नहीं हुआ  कुछ एक नाजुक घायलों को छोड़ कर . और न ही कुछ विशेष हानि बाबा को हुई है.....जो है ही फकीर उसका नारा ही होता है... नंगा ही आया था ...और नंगा ही जाऊंगा ...उसका कोई क्या बिगड़ सकता है  ?  हाँ यदि बहुत बड़ा नुक्सान किसी का हुआ है तो वोह है ..कांग्रेस पार्टी . और कितना नुक्सान हुआ है....यह तो भविष्य में आने चुनाव ही बता सकते हैं . केद्रीय सरकार को यह समझना चाहिये कि आस्था सब पर भारी पड़ती है .
अभी अभी समाचार आ रहे हैं कि बाबा राम देव की स्तिथि अत्यंत नाजुक हो गई है और उन्हें (  चिकित्सालय )  I.C.U. में भर्ती करवाया गया है . श्री श्री रविशंकर भी उनके साथ I.C.U ( चिकित्सालय ) में उपस्थित है . राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल जो आजकल  देहरादून में हैं ..ने भी बाबा राम देव के स्वास्थ्य के विषय में चिंता जतलाई है . ईश्वर  उन्हें लंबी आयु दे....व्यवस्था को सुधारने वाले ऐसे आध्यात्मिक गुरु सदियों में एक बार पैदा होते हैं .


विनायक  शर्मा
राष्ट्रीय संपादक " विप्र वार्ता "
पंडोह , मंडी

हिमाचल में सियासत की गर्मी

( यह  लेख साप्ताहिक " अमर ज्वाला " ६ जून २०११  (हिमाचल ) से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र में प्रकाशित हो चुका है) 

                     ग्रीष्म- काल पूरे देश में अपना प्रकोप दिखा रहा है . हिमाचल प्रदेश भी ग्रीष्म -काल की गर्मी से अछूता नहीं है . फिर ऊपर से जान लेवा महंगाई भी इस मौसम की तपिश को और बढ़ा रही है . इस जान लेवा महंगाई  से क्या  मजदूर , किसान , कामगार और आम आदमी सभी त्रस्त है , झटके पे झटका ...कभी धीरे से कभी जोर से....क्या करें सहने को मजबूर हैं . अब गर्मी के मौसम ने अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर दिया है....ऐसी चिप- चिपी गर्मी और ऊपर से पानी की कमी ...प्राकृतिक स्रोत तो कब के सूख गए . सरकारी नलों के  पानी की भी क्या बात करें ...वोह भी सरकार की ही तरह अपनी मर्जी का मालिक है . इस तपती गर्मी में घरों या वृक्षों तले बैठ ...सुस्ताने के साथ-साथ आने वाले समय में पैट्रोल , डीजल  और रसोई गैस के बढने वाले  दामों की आशंका से सभी चिता ग्रस्त हैं. 
            हिमाचल के मौसम में कुछ गर्मी हमारे सियासी भाइयो के कारण भी बढ गई है . हमारे राज नेता दो वर्ष उपरांत  होने वाले हिमाचल प्रदेश के चुनाव के लिए अभी से वार-प्रहार बचाव  के साथ-साथ अपनी-अपनी बिसात बिछाने के लिए किसी किसी बहाने..प्रदेश के दौरों में व्यस्त है . तू डाल-डाल मैं पात-पात वाली कहावत चरितार्थ करते हुए एक दूसरे  के गढ़ भेदने आरोप-प्रत्यारोप में मशगूल इन सियासी दलों को अपने ही लोगों  से  भीतर-घात की  कितनी आशंका है यह  जन सामान्य से छुपा  नहीं है . पिछले विधानसभा चुनाव के समय किसने विरोधी दल के किस प्रत्याशी का साथ दिया..किसने अपने दल के किस प्रत्याशी का भीतर खाते विरोध किया ...यह सब जानते हैं फिर चाहे वोह मंडी जिले का  सदर निर्वाचन क्षेत्र हो या फिर काँगड़ा या  उपरी शिमला  जिले का ..भीतर घात तो सभी दलों मैं है .
            अनुशासन हीनता और भीतर घात की महामारी से सभी दलों को दो- दो हाथ होना पड रहा है. सभी दलों मैं गुटबाजी है . और यह भी किसी से छुपा नहीं है कि सभी दलों की हाई कमान का  निर्णय ही सर्वमान्य निर्णय होगा . पूर्व  कि भांति टिकट चाहने वालो ने अभी से ऊपर का जुगाड़ करना शुरू कर दिया है . जब  खानसामे  और  व्यक्तिगत   सुरक्षा कर्मी या अधिकारी ,   हाई कमान के मेहरबान होने पर सभी वरीयताएं अनदेखी अनसुनी करते हुएपार्टी का चुनाव टिकट प्राप्त कर सकते हैं तो पार्टी से जुड़े अन्य लोग क्यूँ  नहीं सीधे  हाई कमान से ही कनक्शन मिलाने की ही  जुगत करेंगे  ?
               उधर आजकल  सत्ताधारी दल में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है . आरोप-प्रत्यारोप , अनुशासन भंग का आरोप और बचाव में अनदेखी व सत्ता के लाभ से वंचित रखने  का उलटवार . सत्ता के नशे में चूर शासकों द्वारा उद्दंडता से " दीवार में घेरने की नाकाम कोशिश " और दूसरी ओर " वीर-पुरुषों की कश्तियों में इस प्रकार के तूफानों को गर्क करने "  का दावा करने के साथ ही हिमाचल के मधु कोरा ,  अ.राजा व कनि मोझी को जनता के सामने खड़ा करने के दावे . बेबसी लाचारी , कुंठाओं से दम घुटने की छटपटाहट यहाँ  भी व्याप्त है . दुश्मन करे दोस्त ने वोह काम किया है....यह पंक्तियाँ दोनों ही पक्ष फुसफुसा रहे हैं. ...खुल कर कोई कुछ कहने को तैयार नहीं .
            अपने रुष्ट नेताओं की मान-मुन्न्वल्ल दूरियां कम  करने के लिए किसी अधिकारिक कद्दावर नेता की मध्यस्तता  की  अपेक्षा गली कुचे के छुटभइयों , पार्टी के नौसीखिए- पदाधिकारियो और चाटुकारों की गाहे-बगाहे बयानबाजी , धमकियाँ  चाटुकारिता द्वारा पद ग्रहण कर सत्ता के निकट होने का ओछा प्रदर्शन.....क्या इन्ही सब के बल पर सत्ताधारी दल अनुशासित हो अगला चुनाव जीतने की मंशा  रखता है ? शासन-व्यवस्था की पारदर्षीय ईमानदारी , दल की  विभिन्न धुरियों से समानता का व्यवहार , पुराने कार्य कर्ताओं का यथोचित सम्मान , समाज के सभी वर्गों की  सत्ता में समान हिस्सेदारी  और कड़ा अनुशासन ही आज के राजनैतिक दलों की परम आवश्यकता है .
                 पार्टी सत्ता का लाउडस्पीकर नहीं ... वरन सत्ता ...पार्टी द्वारा पारित की गई नीतियों , चुनाव पूर्व  किये गए वायदों , विकास जन कल्याण के कार्यों को लागू करने का एक तंत्र मात्र ही है . प्रदेशों में प्रदेश के पार्टी अध्यक्षों का स्थान प्रदेश के मुख्यमंत्रियों  से ऊपर दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों का स्थान प्रधान-मंत्रियों से ऊपर होता है यानि सत्ता पर दलों की प्रभुसत्ता होनी चाहिये . परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं हो रहा है..इन्दिरा जी के ज़माने से ही यह प्रथा लगभग समाप्त ही हो  गई थी  और राजनैतिक दल  सत्ता की जेब का खिलौना मात्र बन कर रह गए . इस बीमारी से कोई भी दल अछूता नहीं है . केवल मात्र कहने से ही नहीं बल्कि यह दिखना भी चाहिए और कार्यकर्ताओं को सन्देश भी जाना चाहिए कि पार्टी के अध्यक्ष का स्थान मुख्य मंत्री से ऊपर है , जिस दल का प्रदेशाध्यक्ष मुख्यमंत्री की चौखट  पर मंत्री बनने की प्रतीक्षार्थियों की पंक्ति  में खड़ा नजरें इनायत होने की बाट जोह रहा हो.....उस दल का क्या भविष्य होगा ..इसका कयास लगाने की मशकत करने की आवश्यकता नहीं....सब जग जाहिर है . मतलब कि उसी  पार्टी का भविष्य उज्जवल है जिसका अध्यक्ष सत्ता की कठपुतली नहीं है.
               पूर्व में सत्ताधारी दल में हाई - कमान द्वारा दो धडों में संतुलन रखने की मंशा से एक तीसरे और निष्पक्ष व्यक्ति को प्रदेश के दल की  कमान सौपी जाती रही थी . परन्तु वर्तमान में पार्टी का मुखिया सत्ता-पक्ष की पसंद का होगा ...चाहे वोह   "  मिट्टी का माधव " ही क्यूँ नहीं हो ..... यदि ऐसा पार्टी के हाई- कमान ने यदि मान  लिया है तो ...मैं एक निष्पक्ष राजनैतिक दृष्टा की हैसियत से यह घोषणा करता हूँ कि हाई कमान की  यह सबसे बड़ी गलती है . खुली छूट  ( free hand )  देना ही पार्टी हाई कमान की सबसे बड़ी गलती है .  आज सत्ता-धारी निरंकुश शासक हो गया है . पंजाब का उधाहरण  हमारे समक्ष  है .  यदि अनुशासन हीनता  का आरोप झेल रहे पुराने और कर्मठ नेताओं ने सूचना के अधिकार द्वारा प्राप्त की गई जानकारी की जुबान से लावा उगलना आरम्भ कर दिया तो आने वाले चुनाव के नतीजों में  सत्ता धारी दल कहाँ होगा ...यह आंकलन करना कठिन नहीं है . 
             आने वाला समय हिमाचल के सत्ताधारी दल और विपक्षी दल के लिए बहुत ही कठिनाइयों  भरा होगा यह आभास अभी से हो रहा है . मंत्रियों व सरकारी तंत्र द्वारा विकास का प्रचार , हाई कमान की चाटुकारिता , या क्रिकेट  मैच की नैया से चुनाव की वैतरणी पार हो जायेगी .. लगता नहीं है.  !
और दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी दल , जिस की केंद्रीय सरकार पर  अरबों रुपयों के भ्रष्टाचार  के आरोप लग रहे हैं , जिसका स्वयं का दामन  विदेशों के बैंको  में अरबो रुपयों के काले धन जमा करने वालों को बचाने के चक्कर मैं दागदार हो रहा है और जिसकी जनविरोधी नीतियों के कारण आज महंगाई सातवें  असमान को छू  रही है  वह दल प्रदेश की सरकार के खिलाफ क्या आवाज उठाएगा....? विभिन्न खेमों मैं बंटा  यह प्रमुख  विपक्षी दल जब भी सर उठाता है...सत्ता पक्ष C D का शोशा छेड़ देता है ठीक वैसे जैसे भा. . पा. जब भी कोई  संगीन मुद्दा  केद्रीय सरकार के विरुद्ध उठाती है ...झट से गुजरात में मोदी के खिलाफ कोई नया आरोप चस्पां हो जाता है .
           प्रायोजित या पक्षीय समाचारों को छोड़ यदि प्रदेश की राजनिति में शौक निष्पक्ष दखल रखने वालों की ओर  रुख किया जाये तो गाहे-बगाहे  ऐसी चर्चाएं  सुनी जा सकती है जिससे यह प्रतीत होता है कि  सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है . शह और मात के इस खेल में अपने भी पराये हो जाते है और कब  धुर विरोधी अपना बन जाये...कोई नहीं जानता .
           प्रदेश के दोनों प्रमुख दलों को आज भीतर-घात से बचने और  कड़ा अनुशासन लागू करने की आवश्यकता है....वर्ना   " हम तो डूबेंगे....तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम " वाली कहावत सिद्ध होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी .

विनायक शर्मा
राष्ट्रीय संपादक ( विप्र वार्ता )
पंडोह ( जिला मंडी )

हिसार उपचुनाव में कांग्रेस.....तो अगले चुनाव में कौन ?

( यह लेख प्रवक्ता.कॉम पर १९/१०/२०११ को प्रकाशित हो चुका है )
मतों की गणना के बाद हिसार लोकसभा उपचुनाव का नतीजा वही आया जिसका अनुमान जनता और पूर्वानुमान सर्वेक्षणों में लगाया जा रहा था. हाँ जातीय समीकरणों के कारण जीत और हार में मतों का अन्तर अधिक नहीं है. अपने पिता भजन लाल के निधन पर रिक्त हुई इस संसदीय सीट से भाजपा-हजका उम्मीदवार कुलदीप बिश्नोई ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी अजय चौटाला को हरा कर विजय प्राप्त की. इस विजय के तमाम कारणों में से एक अन्ना की टीम का कांग्रेस को वोट न देने की अपील भी है. अब नतीजे घोषित होने के पश्चात् दंगल में उतरे सभी दल हार-जीत के अलग-अलग कारण बता रहे हैं, परन्तु मतों के पक्ष-विपक्ष में इधर से उधर जाने और कुछ जाति विशेष के मतों के ध्रुवीकरण और केंद्र में कांग्रेस सरकार के जनविरोधी फैसले अवश्य ही हार-जीत का कारण बने हैं. चुनाव परिणाम पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. इतना तो स्पष्ट है कि पिछले लोकसभा चुनाव की ही तरह इसबार भी कांग्रेस तीसरे नंबर पर ही है और इस चुनाव में उसे लगभग 55,000 वोट अवश्य ही कम मिले हैं जिसके पीछे कहीं न कहीं निम्न कारण दिखाई देते हैं :
(1) भ्रष्टाचार, घोटालों और महंगाई के कारण केंद्र सरकार के प्रति जन-आक्रोश
(2) कुलदीप बिश्नोई और अजय चौटाला के लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना
(3) जातीय मतों का ध्रुवीकरण, और
(4) टीम अन्ना का कांग्रेस को वोट न देने की अपील.
अब नतीजा आने पर टीम अन्ना हजका के उमीदवार की विजय के पीछे अपनी अपील बता रही है. यदि इस पर विश्वास कर भी लिया जाये तो निष्कर्ष यह निकलता है कि ( पिछले और अब के चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में पड़े मतों के अंतर को देखें तो ) अन्ना की अपील कांग्रेस के मात्र 25% वोटरों को ही प्रभावित करने में सफल हुई है. आने वाले हरियाणा विधान सभा के चुनाव के मद्देनजर तो इनेलो या हजका जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए यह हार-जीत अवश्य ही बहुत मायने रखती होगी अन्यथा राष्ट्रीय परिपेक्ष में इस हार-जीत से किसी भी दल को कोई फर्क नहीं पड़नेवाला. इस सब के बावजूद हिसार  उपचुनाव कुछ अनुतरित्त प्रश्न देश के सामने खड़ा करता है जिन्हें समझना आवश्यक है.
अन्ना और उनकी पूरी टीम देश से भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए जन-लोकपाल अधिनियम बनाए के लिए संसद और सरकार पर दबाव बना रही है जिसके लिए देश भर की आम जनता जनार्धन ने भी दलों और संगठनों की दीवारें तोड़ते हुए भ्रष्टाचार में लिप्त सभी राजनैतिक दलों को तो एक बार झझकोर कर रख दिया था. परन्तु संसद के शीतकालीन सत्र में बिल को पारित करवाने के लिए दबाव बनाते हुए हिसार के उपचुनाव में ही कांग्रेस का ही विरोध क्यों किया ? क्या किसी एक दल विशेष का विरोध, राजनीति नहीं है ? भ्रष्टाचार जैसे एक अहम् और विशेष मुद्दे के उन्मूलन के लिए चलाये जा रहे एक गैर-राजनैतिक आन्दोलन की सफलता के लिए एक दल विशेष का विरोध कहाँ तक उचित है भ्रष्टाचार में तो सभी दल लिप्त हैं, कुछ कम तो कुछ ज्यादा. एक दल विशेष का विरोध कर टीम अन्ना तो मात्र बोतलें ही बदल रही है मदिरा तो वही पुरानी है. टीम अन्ना का यह उत्तर कि चूँकि बिल लोकसभा ने पारित करना है इसलिए लोकसभा के उपचुनाव में ही कांग्रेस का विरोद्ध किया था, समझ से परे है.  हिसार के उपचुनाव में 40 उम्मीदवार अपना भाग्य अजमा रहे थे. भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए लाये जा रहे बिल पर दबाव बनाए के लिए एक भ्रष्टाचारी का विरोध जिसका परोक्ष लाभ अन्य भ्रष्टाचारियों को मिले यह कहाँ की बुद्धिमता ? हिसार उपचुनाव में खड़े तीन प्रमुख उम्मीदवारों या उनके दलों का पूर्व का इतिहास क्या रहा है यह सभी जानते हैं. जाति-नीति पर चलनेवाली हरियाणा की राजनीति को समझने वालों ने तो इस चुनाव के नतीजों की घोषणा तो परिणाम आने से पूर्व ही कर दी थी तो क्या उसी क्षेत्र के रहने वाले टीम अन्ना के अहम् सदस्य अरविन्द केजरीवाल यह सब नहीं समझते होंगे
जिस प्रकार से टीम अन्ना ने हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोद्ध किया उसका लाभ निश्चित तौर से उन दलों या उम्मीदवारों को मिला जो उसके हकदार नहीं थे. कांग्रेस के विरुद्ध यह किस प्रकार की दबाव की रणनीति है चलाई जा रही है ? यह दबाव नीति है या भयदोहन ? मुझे तो इन सब के विपरीत एक छलावा ही लगता है जो देश और अन्य राजनैतिक दलों को भरमाने के लिए रचा जा रहा है कि टीम अन्ना एक गैर राजनैतिक मंच है. अभी तो यह एक कमजोर हमला कांग्रेस पर किया गया है जिससे कांग्रेस  को कोई क्षति नहीं हुई है, हाँ भाजपा सहित अन्य दल अवश्य ही प्रफुल्लित हो रहे हैं. परन्तु इसके साथ ही प्रश्न उठता है कि आने वाले अगले चुनाव में टीम अन्ना का शिकार कौन होगा ? अगले वर्ष देश के पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होने है उससे पूर्व संसद के शीतकालीन सत्र में यदि लोकपाल अधिनियम पारित हो जाता है तो निश्चित रूप से टीम अन्ना का अगला शिकार अलग-अलग राज्यों में शासन-सत्ता चलाने वाले गैर कांग्रेसी दल हो सकते हैं.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के विरोद्ध में प्रचार करने का पूर्वघोषित दौरा अचानक बीच में छोड़ कर अन्ना का मौन व्रत पर बैठ जाना क्या जनता में संशय पैदा नहीं करता और फिर एक समाचार चैनल में दिए गए साक्षात्कार में यह वक्तव्य देना कि यदि कांग्रेस शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल बिल पारित कर देती है तो वह कांग्रेस के साथ मिल कर काम करने को तैयार हैंक्या दर्शाता है इसका अर्थ यह हुआ कि कांग्रेस का विरोद्ध या केंद्र सरकार पर दबाव केवल लोकपाल बिल को पारित करवाने के लिए ही है ? बिल पारित हो जाने के पश्चात्  क्या कांग्रेस को उसके  शासन में हुए तमाम घोटालों, भ्रष्टाचार के आरोपों , विदेशी बैंकों से कालेधन की वापसी, रामदेव के अनुयाइयों पर दिल्ली  में हुए अर्ध-रात्री को लाठियां बरसाने आदि के तमाम आरोपों से मुक्त कर दिया जायेगा
भ्रष्टाचार के उन्मूलन के मुद्दे पर सारे देश को अनुशासित हो प्रदर्शन करने को विवश कर देने वाले अन्ना हजारे के इस प्रकार के कार्य कलापों से तो भय सा लगने लगता है. विभिन्न  राज्यों में शासन चलाने वाले अन्य राजनैतिक दल भी क्या इसी दिशा में सोचते हैं कि हिसार उपचुनाव में कांग्रेस......तो अगले चुनाव में कौन ?

विनायक शर्मा
राष्ट्रीय संपादक विप्र वार्ता

पंडोह, मंडी ( हिमाचल प्रदेश )